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बुधवार, 14 मार्च 2012

रेल का सपना


रेल का सपना
रेल बजट से उत्तराखंड वासियों को इस बार बडी उम्मीद थी...कि शायद इस बार बजट में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पहाड में रेल चढाने के लिए बजट में जरूर इसे शामिल करेगे...लोगों की ये उम्मीद बेवजह भी नहीं थी...इसके पीछे की एक बडी वजह थी...प्रदेश के पांचों सांसद औऱ सभी के सभी कांग्रेसी...और केन्द्र में सरकार भी कांग्रेस की...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...रेल मंत्री ने बजट में उत्तराखंड को दरककिनार कर दिया। हालांकि रेल बजट पेश करने से पहले दिनेश त्रिवेदी का कहना था कि बजट से पहले सभी सांसदों औऱ सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशवरा किया गया है...ताकि हर राज्य के लिए बजट में कुछ ना कुछ हो...लेकिन बजट पेश होने के बाद साफ हो गया कि रेल मंत्री की बातों में कितना दम था। बजट में उत्तराखंड के उपेक्षित रहने के पीछे बडी वजह प्रदेश के पांचों कांग्रेसी सांसद हरीश रावत, प्रदीप टम्टा, के सी सिंह बाबा, सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा भी है...जाहिर है ये पांचों सांसद प्रदेश की जनता का आवाज़ को पुरजोर तरीके से रेल मंत्री के सामने नहीं रख पाए...जिस वजह से छुकछुक गाडी में सफर करना पहाड के लोगों के लिए एक सपने की तरह रह गया। खास बात यह है कि आजादी के बाद से भारतीय़ रेल ने लंबी छलांग लगायी...लेकिन उत्तराखंड में आज़ादी के बाद से एक किमी भी नई रेल लाईन नहीं बिछ पायी...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड कितना उपेक्षित रहा है। हालांकि कुछ समय पहले रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने गौचर में ऋषिकेश से लेकर कर्णप्रयाग तक की प्रस्तावित रेल लाईन का शिलान्यास किया था...लेकिन ये प्रस्तावित रेल मार्ग जमीन के मसले को लेकर राजनीति की भेंट चढ गया...ऐसा ही कुछ हाल चंपावत – बागेश्वर रेल लाईन का भी हुआ जो सर्वे हो जाने के बाद भी अधर में लटकी हुई है। हालत ये है कि उत्तराखंड में रेल मैदान को छूती हुई ही निकल जाती है...औऱ पहाड के लिए रेल आज भी एक सपना बना हुआ है। जिन मैदानी इलाकों में रेल सेवा है भी वहां के लोग लंबे समय से देश के प्रमुख शहरों के लिए सीधी रेल सेवा की मांग कर रहे हैं...लेकिन उनकी ये आवाज दिल्ली पहुंचने से पहले ही दम तोड देती है। बहरहाल उत्तराखंड में अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने को लेकर प्रदेश के सांसद अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करते नहीं थकते...लेकिन प्रदेश के विकास के लिए प्रदेशवासियों के लिए उनके पास समय नहीं है...शायद यही वजह है कि रेल के नक्शे में उत्तराखंड का वजूद ना के बराबर है...औऱ पहाड पर रेल का चलना पहाड के लोगों के लिए किसी सपने से कम नहीं है। उम्मीद करते हैं कि शायद हमारे सांसद दिल्ली में अपनी आवाज प्रदेश की जनता के लिए बुलंद करेंगे ताकि पहाड का विकास हो यहां के लोगों को विकास हो...औऱ अगला रेल बजट उत्तराखंड के लिए खुशियों की सौगात लेकर आये।
दीपक तिवारी

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

आपदा से कम नहीं सडक हादसे...



बाईक औऱ स्कूटर पर स्टंट करते युवा आपको कहीं ना कहीं जरूर दिख जाएंगे...स्टंट करने में भले ही इन युवाओं को खूब मजा आता हो...लेकिन ये नहीं जानते कि इनका ये मजा ना जाने कब इऩके लिए जीवन भर की सजा बन जाए। बाईक और स्कूटर पर खतरनाक स्टंट करते युवाओँ की टोली आये दिन किसी ना किसी हाईवे पर दिखाई दे जाती है...इन युवाओं को ना तो पुलिस का खौफ होता है...औऱ ना ही मौत का। सडक दुर्घटनाओं में 40 प्रतिशत लोगों की मौत टू व्हीलर औऱ ट्रक की वजह से होती है...जिसमें भी अधिकतर मौत सिर में चोट लगने की वजह से होती हैं...यानि की हेलमेट ना पहनने के कारण भी लाखों लोग हर साल बेमौत मारे जाते हैं। दुनिया भर में हर घंटे तकरीबन 40 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं जिनकी उम्र 25 साल से कम होती है। भारत में हर साल करीब अस्सी हजार से ज्यादा लोगों की मौत सडक दुर्घटना में होती है...करीब एक करोड से ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी होते हैं...और लगभग तीन लाख लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के मुताबिक पूरी दुनिया के मुकाबले, भारत सड़क दुर्घटनाओं में अव्वल है...2010 की ही अगर बात करें तो तकरीबन एक लाख 60 हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे गए थे। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी) की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश सड़क दुर्घटना में 12 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा भागीदार है। आंध्र प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर 11 प्रतिशत के साथ उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र है। दुनिया में भारत सडक दुर्घटनाओं में अव्वल है...भारत में इतनी मौतें शायद किसी बडी आपदा के आने से नहीं होती हैं जितनी मौत सडक दुर्घटनाओं में होती है। देखा जाए तो भारत में सडक दुर्घटनाएं आपदा का रूप ले चुकी हैं...और सडक पर चलते चलते आने वाली ये आपदा कब किसे मौत की नींद सुला दे कोई नहीं जानता। सडक पर आने वाली इस आपदा के शिकार लोगों में टू व्हीलर पर बिना हेलमेट के चलने वाले लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है। ऐसा नहीं है कि हम इस आपदा से बच नहीं सकते...हम इस आपदा से बच सकते हैं अगर हम जरा सी सावधानी बरतें...टू व्हीलर चलाते समय हेलमेट पहनें तो काफी हद तक हम इस आपदा में होने वाली मौत के आंकडे को कम कर सकते हैं। आज की भागदौड भरी जिंदगी में जीवन का पहिया तेजी से दौड रहा है...फैसला आपके हाथ में है...कि आपको दौडते रहना है...या फिर किसी दिन अचानक रूक कर बिखर जाना है।

दीपक तिवारी

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

मैं आज़ाद हूं...


मैं आज़ाद हूं...

गुलामी के उस दौर में जब गोरों के जुल्म को देश के तमाम लोगों ने नियति मान लिया था...उसी दौर में एक किशोर गोरी हुकूमत की ताबूत में कील ठोकने पर आमदा हो जाए तो इसे हम क्या कहेंगे...गोरों के बनाये कायदे कानून तोडने के लिये एक छोटे से लडके को जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था उसे बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पडते थे और उसकी चमडी उधेड डालते थे...वह 'महात्मा गान्धी की जय' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लडका तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लडका उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के दल का एक बडा नेता बना...जी हां मैं बात कर रहा हूं...महान बलिदानी क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जो 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में गोरी हुकुमत से युद्ध लड़ते-लड़ते शहीद हो गए थे...1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण आजाद की विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशनके  सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया इसके बाद सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का वध करके लिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने स्वभाव से साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे। साण्डर्स की हत्या और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फांसी की सजा पाने वाले तीन क्रान्तिकारी साथियों भगत सिंह, राजगुरुसुखदेव की शहादत के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद बेहद दुखी हो गये थे। एक रोज इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बैठ आजाद को गोरे सिपाहियों ने घेर लिया...आजाद ने अंग्रेजों के आगे आत्मसमर्पण करने की बजाए जान देना बेहतर समझा और अपने पास बची आखिरी गोली खुद को मार ली। यह दुखद घटना 27 फरवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी। आजाद की पुण्यतिथी पर आपको आजाद के जीवन के कुछ संस्मरणों से अवगत कराना चाहूंगा...एक बा‍र आजाद कानपुर के मशहूर व्यवसायी सेठ प्यारेलाल के निवास पर एक समारोह में आये हुये थे...प्यारेलाल प्रखर देशभक्त थे और प्राय: क्रातिकारियों की आथि॑क मदद भी किया क‍रते थे...आजाद और सेठ जी बातें कर ही रहे थे तभी सूचना मिली कि पुलिस ने हवेली को घेर लिया है...प्यारेलाल घबरा गये फिर भी उन्होंने आजाद से कहा कि वे अपनी जान दे देंगे पर उनको कुछ नहीं होने देंगे। आजाद हँसते हुए बोले-"आप चिंन्ता न करें, मैं कानपुर के लोगों को मिठाई खिलाये बिना जाने वाला नहीं।" फिर वे सेठानी से बोले- "आओ भाभी जी! बाह‍र चलकर मिठाई बांट आयें।" आजाद ने गमछा सिर पर बाँधा, मिठाई का टो़करा उठाया और सेठानी के साथ चल दिये। दोनों मिठाई बांटते हुए हवेली से बाहर आ गये। बाहर खडी पुलिस को भी मिठाई खिलायी। पुलिस की आँखों के सामने से आजाद मिठाई-वाला बनकर निकल गये और पुलिस सोच भी नही पायी कि जिसे पकडने आयी थी वह परिन्दा तो कब का उड चुका है...चन्द्रशेखर आज़ाद हमेशा सच बोलते थे। एक बार आजाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहां एक दिन पुलिस आ गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आजाद से पूछा-"बाबा....आपने आजाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आजाद तपाक से बोले- "बच्चा आजाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आजाद रहते‌ हें हम भी तो आजाद हैं।" पुलिस समझी बाबा सच बोल रहा है, वह शायद गलत जगह आ गयी है अत: हाथ जोडकर माफी माँगी और उलटे पैरों वापस लौट गयी। ऐसे थे आजाद...27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि थी...जिनका योगदान भारत की आजादी में इतना अहम है कि जब ये योद्धा गोरों से लोहा लेते हुए शहीद होता है तो उसकी शहादत को महात्मा गांधी से लेकर मदनमोहन मालवीय सरीखे स्वतंत्रता सेनानी महान बलिदान करार देते हैं...लेकिन हमारे देश में बडे – बडे नेताओं के जन्मदिन औऱ पुष्यतिथी पर तो बडे बडे आजोयन होते हैं...लेकिन देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले महान क्रांतिकारियों के ना तो जन्मदिन किसी को याद रहता है औऱ ना ही शहादत। हमारे देश की सरकार को तो आजाद की शहादत तो याद रही नहीं...औऱ ना ही उऩ राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को जो अपनी पार्टी के किसी नेता के जन्मदिन या पुण्यतिथी पर शहरों को बैनर – पोस्टरों से पाट देते हैं...लेकिन जिनकी बदौलत आज ये लोग खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं...उनकी जन्मदिन औऱ शहादत तक इन्हें याद नहीं रहती।
दीपक तिवारी

गंगा तेरे वास्ते...



गंगा तेरे वास्ते बातें तो बड़ी बड़ी होती हैं...आंदोलन किये जाते हैं...धरना प्रदर्शन किये जाते हैं...करोडों की योजनाएं बनायी जाती हैं...धरना...प्रदर्शन औऱ आंदोलनों से कोई अपनी राजनीति चमका रहा होता है...तो करोडों की योजनाओं से गंगा को साफ करने वाले अपनी जेबें रोशन कर रहे होते हैं...ये सब होता है गंगा तेरे वास्ते...लेकिन मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि गंगा तू आज पहले से और ज्यादा मैली हो गयी है...तेरी अविरलता...निर्मलता...स्वच्छता धुंधली पडती जा रही है। इसी अविरलता और स्वच्छता को लेकर संत समाज हमेशा से आवाज बुलंद करता रहा है...लेकिन ये वही संत हैं...जो परंपरा के नाम पर किसी संत के निधन पर उस संत के शव को जल समाधि देने की बात कहते हुए गंगा में बहा देते थे...उस शव से गंगा में फैल रहा प्रदूषण इन संतों को नजर नहीं आता था...लेकिन सालों पुरानी ये परंपरा को एक संत ने ही तोडा है...एक नया इतिहास रचा है...ताकि गंगा की निर्मलता...स्वच्छता बरकरार रहे...गंगा तेरे वास्ते...महंत शंकर दास ने अपना शरीर छोडने से पहले संत समाज से कहा था कि जल समाधि के नाम पर उनका शव गंगा में ना बहाया जाए...बल्कि उसे जलाया जाए...महंत ने इसकी शुरूआत तो कर दी है...लेकिन बडा सवाल ये है कि क्या संत समाज महंत शंकर दास की गंगा के वास्ते इस आहुति की जोत को क्या जलाए रखने में सफल होगा...या फिर महंत शंकर दास की आहुति की ये जोत...उऩकी राख ठंडी होने के साथ ही मंद पड़ जाएगी। महंत शंकर दास ना सिर्फ संत समाज के लिए ये जोत जलाकर गये हैं...बल्कि गोमुख से लेकर गंगासागर तक गंगा के तट पर बसने वाले उन 40 करोड लोगों के लिए भी इस जोत को रोशन करके गये हैं...लेकिन क्या ये 40 करोड लोग इस जोत की मशाल को थाम कर गंगा के तटों पर फेंके जाने वाले करोडों टन कचरे की मात्रा को कम करने का संकल्प लेंगे। गंगा की अविरलता औऱ स्वच्छता कुछ हद तक बच सकती है...अगर संत समाज और गंगा के तट पर बसने वाले 40 करोड लोग महंत शंकर दास की जोत को जलाए रखने में कामयाब रहते हैं। गंगा को साफ करने के लिए करोडों खर्च किये जा चुके हैं औऱ करोडों की योजनाएं पाइपलाइन में हैं...लेकन गंगा की अविरलता और स्वच्छता सही मायने में तब तक नहीं लौट सकती जब तक हम गंगा में फेंकें जा रहे करोडों टन कचरे को रोकने में कामयाब नहीं होते...और ये सब होगा आपकी अपनी इच्छाशक्ति से...तो आज आप भी संकल्प लें अपने आस पास की गंगा को गंगा ही रहने दें...कोई गंदा नदी नाला ना बनने दे...सिर्फ गंगा के वास्ते।

दीपक तिवारी

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

जूतम पैजार


जूतम पैजार

पिछले कुछ समय से जूते का चलन बढता जा रहा है....फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जूता सिर्फ पैर में नजर आता था.....लेकिन अब जूता हाथों में हथियार के रूप में नजर आता है...इसका पहला फायदा तो ये है कि आसानी से आप जूते को कडी से कडी सुरक्षा वाली जगह पर ले जा सकते हैं...और मौका मिलने पर भरी सभा में सामने वाले की ईज्जत उतार सकते हैं...औऱ इससे सामने वाले को ऐसी चोट लगती है....कि शायद ही सामने वाले इसका दर्द कभी भूल पाये।
जूता मारने की परंपरा तो बरसों से रही है...कभी चोरी करते पकडे गये किसी चोर को जुतिआया जाता रहा है...तो कभी मनचलों की जूतम- पैजार होती आयी है...लेकिन सबसे पहले जूता रूपी अस्त्र तब सुर्खियों में आया जब ईराक में जॉर्ज बुश पर चला था जूता। पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी ने सबके सामने एक के बाद दो जूते दे मारे थे बुश पर लेकिन किस्मत अच्छी थी कि बच गए बुश।
इसके बाद हिंदुस्तान में भी पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी का फार्मूला खूब हिट हुआ औऱ जूता बन गया नया हथियार...इसके पहले शिकार बने हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम...फिर बारी थी बरसों से पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की...हथियार रूपी जूते का ये सिलसिला यहीं नहीं रूका समय समय पर इसका भरपूर उपयोग होता रहा...कभी कांग्रेस नेता जनार्दन द्रिवेदी तो कभी सांसद नवीन जिंदल पर। ऐसा नहीं है कि सिर्फ राजनेता ही सरेआम बेईज्जत हुए...टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल पर भी ऐसे ही हमले हुए। प्रशांत भूषण को जहां एक युवक ने उऩके केबिन में घुसकर जमकर लात घूसों से पीटा...वहीं केजरीवाल पर लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान चप्पल फेंकी गयी।
भरी सभा में नेताओं को बेईज्जत करने का ये तरीका भी खूब हिट हो रहा है। गाहे बगाहे लोग नेताओं पर जूते – चप्पल मारकर उन्हें बेईज्जत करने में नहीं चूक रहे हैं। नेताओं को सरेआम बेईज्जत करने का ये चलन अब दूसरे रूप में भी सामने आ रहा है...जिसके पहले शिकार बने केन्द्रीय मंत्री शरद पवार...एक कार्यक्रम में पहुंचे शरद पवार को तो एक युवक ने उस समय जोरदार थप्पड रसीद कर दिया जब वे पत्रकारों के कुछ सवालों का जवाब दे रहे थे। शरद पवार भले ही युवक के खिलाफ कोई कारवाई न करने की बात कर रहे हों...लेकिन सरेआम कैमरे के सामने पडे थप्पड़ का दर्द शायद ही शरद पवार कभी भूल पाएं।
ऐसा ही कुछ घटनाक्रम पिछले दिनों बाबा रामदेव के साथ भी घटा...जब एक व्यक्ति ने उऩके चेहरे पर दिल्ली में पत्रकार वार्ता के दौरान काली स्याही डाल दी...हालांकि यहां पर बाबा रामदेव के समर्थकों ने इसके पीछे कांग्रेस का हाथ बताते हुए बदले के भाव से दिल्ली में कांग्रेस दफ्तर के बाहर सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोत दी। ये कुछ एक उदाहरण थे जो बीते कुछ समय में घटित हुए...जिनके जरिए कहीं पर नाराज लोगों ने अपने – अपने तरीके से सामने वाले को बेईज्जत किया। हालांकि ज्यादातर ऐसे मामलों में इसके शिकार नेताओं ने बेईज्जत करने वाले को माफ कर बडप्पन दिखाने का प्रयास किया...लेकिन इसका दर्द शायद ही उनके दिल से कभी जाए।
कुल मिलाकर पैरों की शान बढाने वाला जूता जाने कब किसके सिर का ताज बन जाए...कहना मुश्किल है। कभी दूसरों को अपने जूते की नोंक में रखने वाले नेताओं को इसी जूते का भय अब सताने लगा है। 
एक कहावत आपने भी शायद सुनी होगी कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते...ये बात अब शायद आमजनता को भी समझ आ गयी है...इसलिए जनता के पैसे को लूटने वाले भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने के लिए लोगों ने जूते – चप्प्ल...लात – घूंसे सबका इस्तेमाल बेधडक शुरू कर दिया है...शायद जूतम पैजार के डर से ही सही भ्रष्ट नेताओं को थोडी अक्ल आ जाए। देखते हैं हमारे राजनेताओं को अक्ल आती है या एक बार फिर किसी कोने से किसी नेता पर जूता चलने की खबर पहले आती है।

दीपक तिवारी

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

राजनीति


राजनीति 

पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर औऱ गोआ में चुनाव की सरगर्मियां अपने चरम पर हैं...सबकी निगाहें इन चुनाव में हैं। देश की राजनीति में दखल रखने वाले सबसे अहम प्रदेश उत्तर प्रदेश में अपना झंडा बुलंद करने के लिए सभी पार्टियों ने ऐडी चोटी का जोर लगा रखा है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से महिलाओं के सहारे ही राजनीतिक पार्टियां सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का ख्वाब देख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सबका सूपडा साफ करने वाली बसपा की कमान जहां एक महिला मायावती के हाथ में है। वहीं भाजपा उमा भारती के सहारे तो कांग्रेस रीता बहुगुणा जोशी के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी है...लेकिन मुख्य भूमिका में कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ही हैं...दूसरी तरफ भाजपा ने मप्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा दी है। कुल मिलाकर इस चुनाव के जरिए नारी शक्ति एक बार फिर से देश को अपनी ताकत का एहसास कराने को बेताब दिखाई दे रही है। हाल ही में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों भी हम नहीं नकारा सकते। दोनों ही राज्यों में दबी कुचली व उपेक्षित माने जाने वाली नारी ने एक बार फिर से अपनी शक्ति का एहसास कराया...और अपनी विजयी पताका फहराते हुए राजनीति हल्कों में खलबली मचा दी। पश्चिम बंगाल में जहां 34 सालों से कायम वामपंथी सरकार को जनता ने नकार दिया...वहीं ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में भी घटा औऱ करुणानिधी सरकार को भी जनता ने आइना दिखा दिया। पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में जीतने वाली दोनों पार्टियों तृणमूल कांग्रेस औऱ अन्ना द्रमुक की कमान महिला ममता बनर्जी औऱ जयललिता के हाथ में थी...जनता ने पुरूष की बजाए महिला नेतृत्व पर अपनी मुहर लगायी। जो देश में महिलाओं के लिहाज से एक सकून देने वाली खबर थी...और इससे निश्चित ही महिलाओं में नयी ऊर्जा का संचार भी हुआ है। राजनीति में महिलाओं ने समय समय पर अपनी शक्ति का एहसास सबको कराया है। बात भले ही सोनिया गांधी की करें जब सोनिया ने 20 साल पहले 21 मई 1991 को अपने पति व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद देर से ही सही कांग्रेस की कमान संभाली और सबके भारी विरोध के बाद भी एक बार फिर से कांग्रेस को स्थयित्व प्रदान किया.....औऱ साबित कर दिया कि महिला की ताकत क्या होती है।
...और यही काम पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार को परास्त करके दिखा दिया। जिसके बाद ममता ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया वहीं वह देश में 14वीं महिला मुख्यमंत्री भी बनीं.....वहीं दूसरी तरफ जयललिता ने दूसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
.....सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के जरिए जनता में अपनी पैठ बना लेने वाली ममता बनर्जी की सादगी औऱ मेहनत का ही नतीजा था कि जनता ने वाममोर्चा को नकारते हुए ममता की तृणमूल कांग्रेस पर अपना भरोसा जताया...औऱ भारी बहुमत से विजयी बनाया...वहीं दूसरी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली जयललिता ने भी भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रही द्रमुक सरकार के खिलाफ जनता का विश्वास जीतने में सफल रही।
...पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजों के जरिए नारी ने भारत ही नहीं समूचे विश्व को अपनी शक्ति का एहसास करा दिया..जो काम इससे पहले दिल्ली में शीला दीक्षित औऱ उत्तर प्रदेश में मायावती कर चुकीं थी। पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में जनता ने महिला नेतृत्व पर भरोसा दिखाकर राजनीति को अपनी बपौती समझने वाले राजनेताओं को करारा जवाब भी दिया है। एक बार फिर से सबसे बडे प्रदेश उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है...औऱ नारी एक बार फिर से अपनी शक्ति दिखाने को बेताब है।

दीपक तिवारी

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

किसका विकास...भारत का या इंडिया का


किसका विकास...भारत का या इंडिया का

ठंड को इतने करीब से कभी महसूस नहीं किया था...औऱ वो भी जन्मदिन के दिन...अपने घर नैनीताल जाने कि लिए दिल्ली से देहरादून पहुंचा तो मालूम चला कि काठगोदाम जाने वाली ट्रेन तो चार घंटा लेट है। जनवरी की सर्दी औऱ उस पर इंद्र देव की मेहरबानी...दोनों की जुगलबंदी ने देहरादून कि फिजाओं में बर्फ सी ठंडक घोल दी। घर जाना जरूरी था इसलिए अगले दिन जाने का फैसला मैं नहीं ले पाया। स्टेशन पर ही ट्रेन का इंतजार करने की ठानी...बैठने की जगह तलाशी तो वेटिंग रूम से लेकर प्लेटफार्म की कुर्सियों पर मुसाफिर कब्जा जमा चुके थे। ऐसे में कुछ देर प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए कभी चाय की चुस्कियों के सहारे तो कभी गरीबों के काजू मूंगफली खाकर समय काटने का प्रयास किया। लेकिन कहते हैं ना कि इंतजार से बुरी कोई चीज ही नहीं वो भी ट्रेन का इंतजार भगवान ही बचाए...लेकिन मरता क्या न करता मजबूरी थी। टहलते  टहलते नजर प्लेटफॉर्म पर खाली हुई कुर्सी पर पडी तो तपाक से जाकर बैठ गया। ठंड से पहले भी सामना हुआ था...लेकिन इस तरह ठंड का सामना पहली बार हो रहा था। एक कंबल साथ में था तो उसे ओढकर बैठ गया...मेरे पास तो कम से कम ठंड से बचने के ले कंबल था उनी कपडे पहने हुए थे। लेकिन जनवरी की इस सर्द रात में हो रही बरसात के बीच प्लेटफार्म में मैंने कुछ ऐसे लोग भी देखे...ज्यादातर मजदूर किस्म के थे...जो सिर्फ एक पतली सी चादर में...औऱ कुछ तो सिर्फ फटी हुई स्वेटर में सिकुड कर सोने की कोशिश कर रहे थे...लेकिन मसूरी से आ रही बर्फीली हवाएं उन्हें कहां सोने देती...पहली बार तब मुझे एहसास हुआ कि हांड कंपाने वाली सर्दी क्या होती है...जिस सर्दी में हम लोग घरों में रजाईयों के अंदर दुबके होते हैं...ब्लोअर चलाकर आराम की नींद ले रहे होते हैं...ऐसे में फुटपाथ में सोने वाले गरीबों के लिए सर्द रात का एक एक पल गुजरना कितना भारी होता है। ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ किसी एक जगह का है...ये आपने भी शायद कई बार महसूस किया होगा...अपनी आंखों से देखा होगा...मेरे लिए भी ये चीज कोई नयी नहीं थी...लेकिन मुझे इसका असल एहसास तब हुआ जब सर्द रात का सामना मुझे करना पडा। हांड कंपाने वाली सर्दी में मेरे चार घंटे तो किसी तरह कट गये...लेकिन जिनके पास पहनने के लिए गर्म कपडे औऱ ओढने के लिए कंबल नहीं है...कैसे उनके लिए रात का हर एक पल रहता होगा...ये मुझे लगातार कचोटता रहा। एक औऱ सवाल इसके साथ ही परेशान करता रहा कि किस झूठी शान में हम लोग जिए जा रहे हैं...एक तरफ तो हम तरक्की की बात कर रहे हैं...वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के 40 करोड से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं...जिनके ना खाने का पता है ना रहने का...जीवन स्तर तो दूर की बात है। सरकार भले ही देश में गरीबों के पर्सेंट में कमी होने का दावा कर रही हो...लेकिन गरीबों की संख्या कम होनी की बजाए बढी है। इसकी एक वजह यह भी है कि गांवों से लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं...जिससे शहरी आबादी बढी तो है...लेकिन लोगों की आय नहीं बढी...औऱ इनमें लाखों ऐसे परिवार हैं जिन्हें दो जून की रोटी तक मयस्सर नहीं होती...औऱ ऐसे ही लोग रोज कमा कर खाते हैं...औऱ इसी तरह हांड कंपाने वाली सर्दी हो या झुलसा देने वाली गर्मी फुटपाथ या रेलवे स्टेशन पर इसी तरह अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। हम भले ही कितनी तरक्की कर लें...विकासशील से विकसित देश हो जाएं...दुनिया हमारा लोहा माने...लेकिन उसकी असली खुशी तभी है...जब पंक्ति के आखिर में खडे लोगों का भी विकास हों...औऱ इस तरक्की का फायदा उनको मिले...वर्ना ये सब बेमानी है। उम्मीद करते हैं कि तरक्की भारत की हो हर भारतवासी की हो न कि इंडिया औऱ उसमें रहने वाले इंडियन की।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

किसका विकास...भारत का या इंडिया का


किसका विकास...भारत का या इंडिया का

ठंड को इतने करीब से कभी महसूस नहीं किया था...औऱ वो भी जन्मदिन के दिन...अपने घर नैनीताल जाने कि लिए दिल्ली से देहरादून पहुंचा तो मालूम चला कि काठगोदाम जाने वाली ट्रेन तो चार घंटा लेट है। जनवरी की सर्दी औऱ उस पर इंद्र देव की मेहरबानी...दोनों की जुगलबंदी ने देहरादून कि फिजाओं में बर्फ सी ठंडक घोल दी। घर जाना जरूरी था इसलिए अगले दिन जाने का फैसला मैं नहीं ले पाया। स्टेशन पर ही ट्रेन का इंतजार करने की ठानी...बैठने की जगह तलाशी तो वेटिंग रूम से लेकर प्लेटफार्म की कुर्सियों पर मुसाफिर कब्जा जमा चुके थे। ऐसे में कुछ देर प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए कभी चाय की चुस्कियों के सहारे तो कभी गरीबों के काजू मूंगफली खाकर समय काटने का प्रयास किया। लेकिन कहते हैं ना कि इंतजार से बुरी कोई चीज ही नहीं वो भी ट्रेन का इंतजार भगवान ही बचाए...लेकिन मरता क्या न करता मजबूरी थी। टहलते  टहलते नजर प्लेटफॉर्म पर खाली हुई कुर्सी पर पडी तो तपाक से जाकर बैठ गया। ठंड से पहले भी सामना हुआ था...लेकिन इस तरह ठंड का सामना पहली बार हो रहा था। एक कंबल साथ में था तो उसे ओढकर बैठ गया...मेरे पास तो कम से कम ठंड से बचने के ले कंबल था उनी कपडे पहने हुए थे। लेकिन जनवरी की इस सर्द रात में हो रही बरसात के बीच प्लेटफार्म में मैंने कुछ ऐसे लोग भी देखे...ज्यादातर मजदूर किस्म के थे...जो सिर्फ एक पतली सी चादर में...औऱ कुछ तो सिर्फ फटी हुई स्वेटर में सिकुड कर सोने की कोशिश कर रहे थे...लेकिन मसूरी से आ रही बर्फीली हवाएं उन्हें कहां सोने देती...पहली बार तब मुझे एहसास हुआ कि हांड कंपाने वाली सर्दी क्या होती है...जिस सर्दी में हम लोग घरों में रजाईयों के अंदर दुबके होते हैं...ब्लोअर चलाकर आराम की नींद ले रहे होते हैं...ऐसे में फुटपाथ में सोने वाले गरीबों के लिए सर्द रात का एक एक पल गुजरना कितना भारी होता है। ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ किसी एक जगह का है...ये आपने भी शायद कई बार महसूस किया होगा...अपनी आंखों से देखा होगा...मेरे लिए भी ये चीज कोई नयी नहीं थी...लेकिन मुझे इसका असल एहसास तब हुआ जब सर्द रात का सामना मुझे करना पडा। हांड कंपाने वाली सर्दी में मेरे चार घंटे तो किसी तरह कट गये...लेकिन जिनके पास पहनने के लिए गर्म कपडे औऱ ओढने के लिए कंबल नहीं है...कैसे उनके लिए रात का हर एक पल रहता होगा...ये मुझे लगातार कचोटता रहा। एक औऱ सवाल इसके साथ ही परेशान करता रहा कि किस झूठी शान में हम लोग जिए जा रहे हैं...एक तरफ तो हम तरक्की की बात कर रहे हैं...वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के 40 करोड से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं...जिनके ना खाने का पता है ना रहने का...जीवन स्तर तो दूर की बात है। सरकार भले ही देश में गरीबों के पर्सेंट में कमी होने का दावा कर रही हो...लेकिन गरीबों की संख्या कम होनी की बजाए बढी है। इसकी एक वजह यह भी है कि गांवों से लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं...जिससे शहरी आबादी बढी तो है...लेकिन लोगों की आय नहीं बढी...औऱ इनमें लाखों ऐसे परिवार हैं जिन्हें दो जून की रोटी तक मयस्सर नहीं होती...औऱ ऐसे ही लोग रोज कमा कर खाते हैं...औऱ इसी तरह हांड कंपाने वाली सर्दी हो या झुलसा देने वाली गर्मी फुटपाथ या रेलवे स्टेशन पर इसी तरह अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। हम भले ही कितनी तरक्की कर लें...विकासशील से विकसित देश हो जाएं...दुनिया हमारा लोहा माने...लेकिन उसकी असली खुशी तभी है...जब पंक्ति के आखिर में खडे लोगों का भी विकास हों...औऱ इस तरक्की का फायदा उनको मिले...वर्ना ये सब बेमानी है। उम्मीद करते हैं कि तरक्की भारत की हो हर भारतवासी की हो न कि इंडिया औऱ उसमें रहने वाले इंडियन की।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

राजनीति के कुहासे में गुम हुआ लोकपाल


राजनीति के कुहासे में गुम हुआ लोकपाल


भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल के समर्थन में अन्ना हजारे की मुहिम को मिले जनसमर्थन के बाद  केन्द्र की यूपीए सरकार ने शीतकालीन सत्र में लोकपाल बिल पेश तो कर दिया...लेकिन सरकार का ये बिल उसी के लिए गले की हड्डी बन गया। सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बाद भी लोकसभा में बहुमत के चलते बिल तो पास करा लिया...लेकिन सरकार राज्यसभा में बिल को पास कराने में ना सिर्फ नाकाम साबित हुई बल्कि रात बारह बजे तक चली बहस के बाद भी सरकार सदन में वोटिंग से ऐन वक्त पर पीछे हट गयी...जिससे लोकपाल बिल राजनीति के कोहरे में खोकर रह गया। सरकार के इस कदम से जहां लोकपाल को लेकर सरकार पर पहले से ही हावी विपक्ष को सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का एक औऱ मौका मिल गया...वहीं सरकार बिल पास न होने का ठीकरा विपक्षी दलों पर फोडती नजर आयी। पक्ष और विपक्ष भले ही लोकपाल के अधर में लटक जाने के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हों...लेकिन मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि करोडों देशवासियों की भावनाओं से जुडा 2011 का सबसे बडा मुद्दा साल के आखिरी महीने के आखिरी सप्ताह में देश का सबसे बड़ा तमाशा बनकर रह गया। इसे तमाशा नहीं तो औऱ क्या कहा जाएगा...कि जिस बिल के समर्थन में अन्ना हजारे ने ताल ठोकी थी...जिसे देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला...जिस बिल ने सरकार की चूलें हिला कर रख दी...वही बिल साल के आखिरी सप्ताह में अपने अंजाम तक पहुंचते – पहुंचते दम तोड गया। एक बार फिर जहां भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों के चेहरे पर निराशा के भाव हैं...वहीं भ्रष्टाचारियों के चेहरे खिले हुए हैं। सवाल बहुत सीधा सा है कि जिस सरकारी लोकपाल का शुरू से ही विरोध हो रहा था...इस सब को जानते हुए भी सरकार ने उसी बिल को संसद में पेश किया...औऱ जैसा कि अनुमान था लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल भाजपा सहित विपक्षी पार्टियों ने बिल का खुलकर विरोध कर इसमें संशोधन की मांग की। हमारे कुछ नेता तो बिल से इतने भयभीत थे कि बिल के पक्ष में ही नहीं थे...संशोधन तो दूर की बात है। हालांकि सरकार ने बहुमत में होने के चलते लोकसभा में तो बिल पास करा लिया...लेकिन राज्यसभा में बहुमत में न होने से सरकार को विपक्ष का भारी विरोध झेलने के बाद अपने पैर पीछे खींचने पडे। जिससे बिल एक बार फिर से अधर में लटक गया...औऱ भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई लडाई भी राजनीति के कुहासे में खो गयी। रही सही कसर टीम अन्ना के आंदोलन से अचानक कदम पीछे खींचने से पूरी हो गयी...हालांकि टीम अन्ना ने पांचों राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में जनवरी – फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस औऱ बिल का विरोध करने वाले दूसरे राजनैतिक दलों के खिलाफ प्रचार कर अपना आंदोलन जारी रखने की बात कही है। बहरहाल लोकपाल को लेकर छाया कुहासा फिलहाल जल्द छंटने के कोई आसार नहीं है...ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में टीम अन्ना की ये मुहिम कितना रंग लाती है...ये तो चुनाव में भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा त्रस्त मतदाता ही तय करेंगे। उम्मीद करते हैं देश के सबसे जरूरी मुद्दे पर सरकार औऱ राजनैतिक दलों के सुपरहिट तमाशे का फल जनता उन्हें जरूर देगी...औऱ ईमानदार औऱ स्वच्छ छवि वाले नेता के हाथों में देश का भविष्य होगा...औऱ भष्टाचारियों को मुंह की खानी पडेगी।

दीपक तिवारी
8800994612 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

लोकपाल से नहीं...खुद से खत्म होगा भ्रष्टाचार


लोकपाल से नहीं...खुद से खत्म होगा भ्रष्टाचार
 

अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी...भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे होंगे...जबकि संसद में सरकार द्वारा पेश लोकपाल कमजोर है औऱ इसमें भ्रष्टाचारियों के बच निकलने का रास्ता है। सरकार कहती है संसद में पेश लोकपाल को सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद तैयार किया गया है...औऱ ये भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में कारगर साबित होगा...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत दूसरी पार्टियां अपने – अपने तर्क देकर संसद में पेश लोकपाल का विरोध कर रहे हैं...लेकिन इस बीच जनमानस के मन में क्या चल रहा है...वो क्या चाहता है...इसका इल्म किसी को नहीं है...लोगों के मन में अभी भी इसको लेकर संशय बरकरार है...कुछ लोग सोचते हैं कि सशक्त लोकपाल बन जाने से भ्रष्टाचार एकदम से खत्म हो जाएगा...जबकि कुछ लोग मानते हैं कि सशक्त लोकपाल आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर बहुत ज्यादा लगाम नहीं लग पाएगी। कुल मिलाकर देखा जाए तो चाहे अन्ना जैसा चाहते हैं वैसा लोकपाल आए या फिर सरकारी लोकपाल...आमजन को इससे बहुत ज्यादा सरोकार नहीं है...इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकपाल के समर्थन में अन्ना कि मुहिम को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला...लेकिन सवाल ये भी उठता है कि महज़ लोकपाल बिल पास हो जाने भऱ से भ्रष्टाचार हिंदुस्तान से खत्म हो जाएगा...भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे पहुंच जाएंगे...इसका जवाब देना आपके लिए भी हो सकता है थोडा मुश्किल हो...लेकिन अगर मुझसे इसका जवाब पूछा जाए तो मेरा जवाब होगा...नहीं। निश्चित तौर पर हर कोई चाहता है कि भ्रष्टाचार रूपी रावण का दहन हो...औऱ भ्रष्टाचारियों को सजा मिले...हर कोई चाहता है कि सरकारी दफ्तर में बिना रिश्वत दिए उसका काम हो जाए...अपने किसी काम के लिए सरकारी दफ्तर में उसे अपनी चप्पलें न घिसनी पडे...लेकिन यहां पर मुझे ये कहने में बिल्कुल भी हिचक नहीं होगी कि जिस भ्रष्टाचार से वह निजात पाना चाहता है...असल में उसकी सबसे बडी वजह भी तो वही है...क्योंकि जब आप सरकारी दफ्तर में अपने किसी काम के लिए जाते हैं तो आप चाहते हैं कि आपका काम आसानी से हो जाए...जल्दी हो जाए...इसके लिए आपको ज्यादा परेशानी न उठाना पडे...औऱ वह आप ही तो हैं जो इसके लिए सामने बैठे कर्मचारी – अधिकारी से जल्दी काम करवाने के तरीके पूछते हैं और मिठाई के नाम पर लेनदेन की बात करते हैं। जब तक जनमानस खुद नहीं ठान लेगा कि वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करेगा औऱ अपने किसी काम के लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लेगा...किसी सरकारी कर्मचारी – अधिकारी को रिश्वत नहीं देगा...तब तक एक प्रतिशत भ्रष्टाचार भी देश से कम नहीं होने वाला...फिर चाहे अन्ना का लोकपाल आए या फिर सरकारी लोकपाल...तस्वीर नहीं बदलने वाली। अरे साहब भ्रष्टाचार के खिलाफ महज शुरूआत तो कीजिए...बदलाव आएगा...किसी लोकपाल का इंतजार मत कीजिए...ये कोई जादू कि छडी नहीं है जो किसी पर चले औऱ वह ईमानदार हो जाए...और वैसे भी जिन लोगों के कंधे पर लोकपाल के माध्यम से भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई का जिम्मा रहेगा वे भी तो इंसान ही है...हो सकता है कहीं उनका ईमान भी डगमगा जाए...जैसा कहते हैं ना – अगर गल ही रूलाती है...तो राहें भी दिखाती है...मनुज गलती का पुतला है...जो अक्सर हो ही जाती है...। अब तक जो गलतियां हुई उन्हें पीछे छोडो...औऱ भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज बुलंद करो...निश्चित तौर पर तस्वीर बदलेगी...एक कदम तो आगे बढ़ाईये।

दीपक तिवारी
8800994612

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

लोकपाल का डर

लोकपाल का डर



लोकपाल को लेकर हो हल्ला मचा है...सडक से लेकर संसद तक एक ही चर्चा है...अखबार से लेकर टीवी तक एक ही खबर छायी हुई है...लोकपाल...अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल आए...प्रधानमंत्री औऱ सीबीआई इसके दायरे में रहें...आम आदमी का सबसे ज्यादा पाला पडने वाले ग्रुप सी औऱ डी के कर्मचारी इसके दायरे में रहें...अन्ना का इसके पीछे तर्क है कि यह सब लोकपाल में होगा तो भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी...अब लोकपाल बिल पास होने के बाद इसका कितना असर होगा ये तो समय ही बताएगा...लेकिन लोकपाल के जिन्न ने देश की राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया है...एक अनजाना सा खौफ हमारे देश के राजनेताओँ पर छाया हुआ है...देश की राजनीति में खासा दखल रखने वाले दो बडे राज्य यूपी औऱ बिहार के कद्दावर नेता मुलायम सिंह औऱ लालू प्रसाद यादव ने तो इसके खिलाफ संसद में ही आवाज बुलंद कर दी है...मुलायम सिंह कहते हैं कि लोकपाल बिल पास हो गया तो एक मामूली सा दारोगा भी उन्हें जेल भेज देगा...कलेक्टर औऱ एसपी उनकी इज्जत नहीं करेंगे...यहां लालू भी मुलायम सिंह का समर्थन करते दिखे...हम कहते हैं...अरे साहब ऐसा काम ही क्यों करते हो कि कोई दारोगा आपको जेल भेजे...कलेक्टर और एसपी आपकी इज्जत न करें...कहीं न कहीं आपके मन में चोर है इसलिए शायद आप लोकपाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं...इतने ही ईमानदार आप होते तो एक सशक्त लोकपाल का समर्थन नहीं करते...।
ये तो रही बात यूपी औऱ बिहार के दो महानुभावों कि...बात अगर करें हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की...क्या वाकई में हमारे देश के प्रधानमंत्री ईमानदार हैं...किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं...अरे साहब हम तो कहते हैं कि अगर वाकई में ईमानदार हो...ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हो तो फिर डर काहे का...ले आओ न सशक्त लोकपाल...खैर कसूर आपका भी नहीं है...आपकी भी मजबूरी है...आपका तो खुद बुरा हाल है...कहते हैं ना...मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो...मैं पीता नहीं हूं पिलायी गयी है...आपको पिलाने वाला तो कोई औऱ ही है...।
केन्द्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में पेश करने जा रही है...इसके लिए संसद का सत्र भी 29 दिसंबर तक बढाया गया है...सरकार के लोकपाल को लेकर जहां टीम अन्ना ने आंखे तरेर रखी हैं...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने भी इसको लेकर कमर कस ली है...औऱ संसद में इस पर जमकर तकरार होने के आसार हैं...।
अब लोकपाल की इस लडाई में जीत किसकी होती है ये तो समय ही बताएगा...लेकिन निश्चित तौर पर लोकपाल का भय़ बिल के पास होने से पहले ही भ्रष्टाचारियों पर दिखाई देने लगा है...उम्मीद करते हैं कि एक सशक्त लोकपाल आए औऱ भ्रष्टाचार में नित नये रिकार्ड बनाते हिंदुस्तान की तस्वीर बदले।


दीपक तिवारी
08800994612
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रविवार, 23 अक्टूबर 2011

जूतम - पैजार


जूतम - पैजार


पिछले कुछ समय से जूते का चलन बढता जा रहा है....फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जूता सिर्फ पैर में नजर आता था.....लेकिन अब जूता हाथों में हथियार के रूप में नजर आता है...इसका पहला फायदा तो ये है कि आसानी से आप जूते को कडी से कडी सुरक्षा वाली जगह पर ले जा सकते हैं...और मौका मिलने पर भरी सभा में सामने वाले की ईज्जत उतार सकते हैं...औऱ इससे सामने वाले को ऐसी चोट लगती है....कि शायद ही सामने वाले इसका दर्द कभी भूल पाये।
जूता मारने की परंपरा तो बरसों से रही है...कभी चोरी करते पकडे गये किसी चोर को जुतिआया जाता रहा है...तो कभी मनचलों की जूतम- पैजार होती आयी है...लेकिन सबसे पहले जूता रूपी अस्त्र तब सुर्खियों में आया जब ईराक में जॉर्ज बुश पर चला था जूता। पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी ने सबके सामने एक के बाद दो जूते दे मारे थे बुश पर लेकिन किस्मत अच्छी थी कि बच गए बुश।
इसके बाद हिंदुस्तान में भी पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी का फार्मूला खूब हिट हुआ औऱ जूता बन गया नया हथियार...इसके पहले शिकार बने हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम...फिर बारी थी बरसों से पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की...हथियार रूपी जूते का ये सिलसिला यहीं नहीं रूका समय – समय पर इसका भरपूर उपयोग होता रहा...कभी कांग्रेस नेता जनार्दन द्रिवेदी तो कभी सांसद नवीन जिंदल पर...हाल ही में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल इसके ताजा – ताजा शिकार बने हैं...ज्यादातर मामलों में जूता मारने वालों को इसके शिकार नेताओं ने माफ कर बडप्पन दिखाने का प्रयास किया...लेकिन इसका दर्द शायद ही उनके दिल से कभी जाए...।
लेकिन कुल मिलाकर पैरों की शान बढाने वाला जूता जाने कब किसके सिर का ताज बन जाए...कहना मुश्किल है। कभी दूसरों को अपने जूते की नोंक में रखने वाले नेताओं के लिए इसी जूते का भय सताने लगा है।  
एक कहावत आपने भी शायद सुनी होगी कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते...ये बात अब शायद आमजनता को भी समझ आ गयी है...इसलिए भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने लोगों ने लातों का ना सही जूते का इस्तेमाल बेधडक शुरू कर दिया है...शायद जूतम – पैजार के डर से ही सही भ्रष्ट नेताओं को थोडी अक्ल आ जाए।




दीपक तिवारी
deepaktiwari@khabarbharti.com
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